विचलित मन
किसी को हो अगर ज़रूरत
तो साँसे ले ले बची हुई मेरी
बहुत लोग यहाँ किसी ना किसी के प्यारे हैं
जब खुद से ही होने लगे अवरोह,
चित्त और मन करें काया से विद्रोह।
जब विचारों में न बचे कुछ शेष,
तो कहो, कैसे होगा जग का समावेश?
चित्त और मन करें काया से विद्रोह।
जब विचारों में न बचे कुछ शेष,
तो कहो, कैसे होगा जग का समावेश?
हर तरफ़ अंधकार ही अंधकार है
दुनिया के चलचित्र कहाँ छुप गए ?
कहाँ गए वो मेले ख़ुशियों के ?
हर जगह अकेलापन ही क्यूँ भरमाया है ?
चाह कर भी नहीं चाहिए कोई आस
ना चाहिए कोई पास
ना हो किसी से कोई बात
ना पूछे कोई मेरा दरहाल
चार दीवारें ही क्यों ज़िंदगी सी है
ये कलम ही क्यों अपनी सी है
ये दुःख है या है असहजपन
नहीं समझ पाया मेरा अंतर्मन
क्यों ख़्याल मेरे बुझे बुझे से हैं
सुध भी कही खोई खोई सी है
ज़िंदगी निरास है
चाह कर भी ना कोई चाह है
खामोशी ही क्यों बस एक सहाय है ?
विचारो में क्यों यह ही एक उपाय है ?
~poetessworld62
💔

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