पिंजरे का पंछी

 


दिखने का मैं बहुत सुंदर हूँ 

दाने की कमी नहींकाफ़ी अमीर हूँ 

सबका चहीता हूँ 

पर क्या करूँपिंजरे का पंछी हूँ 


इंसानों की भाषा जानता हूँ 

हुनरमंद तो बहुत हूँ

पंख हैं पर उड़ने को बेबस हूँ

क्या करूँपिंजरे का पंछी हूँ 


सपने मेरे खुली हवाओं में 

मंज़िल दूर आकाश में 


आवारा परिंदे उड़ते देखता हूँ 

मिलने को उनसे तरसता हूँ 

पर क्या करूँ पिंजरे का पंछी हूँ 


घर ले जाने को बेताब हैं लोग मुझे 

शायद बहुत मूल्यवान हूँ 


आकाश में परिंदों का झुंड कहाँ जाता होगा

क्या ख़याल इनको मेरा भी आता होगा

शायद में उनको दिख नहीं पाऊँ 

चहक नहीं पाता हूँ जब आवाज़ उनको लगाता हूँ 

शायद उनकी भाषा बोल नहीं पाता हूँ 

इंसानों की भाषा कैसे उन तक पहुँचाऊँ


सोचते सोचते चाँद की चाँदनी में घिर जाता हूँ 

सोने की दीवारों को देखता हूँ 

और 

रोज़ मख़मल के चद्दर में सोता हूँ

पर क्या करूँपिंजरे का पंछी हूँ 

~poetessworld62 

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