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Showing posts from April, 2022

पिंजरे का पंछी

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  दिखने   का   मैं   बहुत   सुंदर   हूँ   दाने   की   कमी   नहीं ,  काफ़ी   अमीर   हूँ   सबका   चहीता   हूँ   पर   क्या   करूँ ,  पिंजरे   का   पंछी   हूँ   इंसानों   की   भाषा   जानता   हूँ   हुनरमंद   तो   बहुत   हूँ पंख   हैं   पर   उड़ने   को   बेबस   हूँ क्या   करूँ ,  पिंजरे   का   पंछी   हूँ   सपने   मेरे   खुली   हवाओं   में   मंज़िल   दूर   आकाश   में   आवारा   परिंदे   उड़ते   देखता   हूँ   मिलने   को   उनसे   तरसता   हूँ   पर क्या   करूँ   पिंजरे   का   पंछी   हूँ   घर   ले   जाने   को   बेताब   हैं   लोग   मुझे   शायद   बहुत   मूल्यवान   हूँ   आकाश   में   परिंदों ...

विचलित मन

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  किसी को हो अगर ज़रूरत  तो साँसे ले ले बची हुई मेरी  बहुत लोग यहाँ किसी ना किसी के प्यारे हैं  जब खुद से ही होने लगे अवरोह, चित्त और मन करें काया से विद्रोह। जब विचारों में न बचे कुछ शेष, तो कहो, कैसे होगा जग का समावेश? हर तरफ़ अंधकार ही अंधकार है  दुनिया के चलचित्र कहाँ छुप गए ? कहाँ गए वो मेले ख़ुशियों के ? हर जगह अकेलापन ही क्यूँ भरमाया है ? चाह कर भी नहीं चाहिए कोई आस  ना चाहिए कोई पास  ना हो किसी से कोई बात  ना पूछे कोई मेरा दरहाल चार दीवारें ही क्यों ज़िंदगी सी है  ये कलम ही क्यों अपनी  सी है  ये दुःख है या है असहजपन  नहीं समझ पाया मेरा अंतर्मन  क्यों ख़्याल मेरे बुझे बुझे से हैं  सुध भी कही खोई खोई सी है  ज़िंदगी निरास है  चाह कर भी ना कोई चाह है  खामोशी ही क्यों बस एक सहाय है ? विचारो में क्यों यह ही एक उपाय है ? ~poetessworld62  💔

इश्क़

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उलझन

💔 उलझन सी होती है ख़्यालों में लेकिन  उलझनो से निकलने को दिल चाहता भी नहीं  शायद जो मेरा मन जानता है वो दिल मानता नहीं  ना जाने इन दोनो को जोड़े हुए वो धागा टूटता क्यूँ नहीं    💔 ~poetessworld62