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सत्य का दर्पण

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सत्य का दर्पण असहज मन में सवाल आया अस्तित्व के सत्य का प्रकृति में उत्तर ढूँढा तो आनंद को पाया परंतु सहज शीतलता बहुत दूर थी। शीतलता की खोज में निकली तो सितारों को पाया झिलमिल ज्योति पर तृप्ति न मिली। सोचा, मंज़िल अभी है दूर, तो रोशनी की राह पकड़ी, पाया सूरज भरपूर। परंतु परितोष फिर भी न आया, मन का दर्पण कांती से ओझल पाया। कांति की खोज में अनंत का ध्यान आया और अनंत की खोज में ब्रह्मांड को पाया परंतु अभी भी समाधान न पाया अब सोचा कि शांत है बहुत दूर शांत की खोज में निकली तो धुन को पाया आलोक तो मिला परंतु एकाकार न पाया। एकांत की खोज में सच ढूँढने निकली तो शून्य को पाया, और पाया कि अनंत तो मेरे अंदर ही था और मैं हमेशा से शून्य। मृगतृष्णा में फँसी.. प्रकृति को विनाश समझी और विनाश को सत्य। परंतु सत्य केवल अनंत को ही पाया और अनंत को  ही शून्य। शून्य ही आरंभ, शून्य ही अंत और शून्य ही शांत, एकांत और पूर्ण सत्य। ~poetessworld62  💖

पिंजरे का पंछी

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  दिखने   का   मैं   बहुत   सुंदर   हूँ   दाने   की   कमी   नहीं ,  काफ़ी   अमीर   हूँ   सबका   चहीता   हूँ   पर   क्या   करूँ ,  पिंजरे   का   पंछी   हूँ   इंसानों   की   भाषा   जानता   हूँ   हुनरमंद   तो   बहुत   हूँ पंख   हैं   पर   उड़ने   को   बेबस   हूँ क्या   करूँ ,  पिंजरे   का   पंछी   हूँ   सपने   मेरे   खुली   हवाओं   में   मंज़िल   दूर   आकाश   में   आवारा   परिंदे   उड़ते   देखता   हूँ   मिलने   को   उनसे   तरसता   हूँ   पर क्या   करूँ   पिंजरे   का   पंछी   हूँ   घर   ले   जाने   को   बेताब   हैं   लोग   मुझे   शायद   बहुत   मूल्यवान   हूँ   आकाश   में   परिंदों ...

विचलित मन

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  किसी को हो अगर ज़रूरत  तो साँसे ले ले बची हुई मेरी  बहुत लोग यहाँ किसी ना किसी के प्यारे हैं  जब खुद से ही होने लगे अवरोह, चित्त और मन करें काया से विद्रोह। जब विचारों में न बचे कुछ शेष, तो कहो, कैसे होगा जग का समावेश? हर तरफ़ अंधकार ही अंधकार है  दुनिया के चलचित्र कहाँ छुप गए ? कहाँ गए वो मेले ख़ुशियों के ? हर जगह अकेलापन ही क्यूँ भरमाया है ? चाह कर भी नहीं चाहिए कोई आस  ना चाहिए कोई पास  ना हो किसी से कोई बात  ना पूछे कोई मेरा दरहाल चार दीवारें ही क्यों ज़िंदगी सी है  ये कलम ही क्यों अपनी  सी है  ये दुःख है या है असहजपन  नहीं समझ पाया मेरा अंतर्मन  क्यों ख़्याल मेरे बुझे बुझे से हैं  सुध भी कही खोई खोई सी है  ज़िंदगी निरास है  चाह कर भी ना कोई चाह है  खामोशी ही क्यों बस एक सहाय है ? विचारो में क्यों यह ही एक उपाय है ? ~poetessworld62  💔

इश्क़

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उलझन

💔 उलझन सी होती है ख़्यालों में लेकिन  उलझनो से निकलने को दिल चाहता भी नहीं  शायद जो मेरा मन जानता है वो दिल मानता नहीं  ना जाने इन दोनो को जोड़े हुए वो धागा टूटता क्यूँ नहीं    💔 ~poetessworld62 

आधी पहचान

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  सब   बहुत   खुश   थे ,  खूब   जश्न   मनाया   मेरे   होने   का   सबको   ना   जाने   कब   से   था   इंतज़ार   मेरे   ही   आगमन   का   दुनिया   में   आयी   मैं   एक   आशीर्वाद   बन   कर   किया   सब   पर   उपकार   उनको   मुस्कान   दे   कर   देखते   ही   देखते   सब   बदलने   लगा   किताबों   में   कही   ना   पाया   व्याख्यान   अंतर्मन   के   सवालों   का   बहुत   प्रयास   किया   अपने   बारे   में   जानने   का   जिज्ञासा   थी   पता   करने   की   कि   मैं   हूँ   कौन ,  क्यूँ   बन   रही   हूँ   मैं   ऐसी   ऐसा   परिवर्तन   अन्य   में   क्यूँ   नहीं   दिख   रहा   ना   मैं ...

सपनों का मकान

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खुद से दूर भागती हूँ जब सच्चाई का प्रतिबिम्ब आँखों  में होता है  मैं अक्सर सपनों  का मकान बनाती  हूँ  जो सच्चाई से मीलों दूर होता है कब तक भागूँ आख़िर थक जाऊँगी  अंतर्मन सब जानता है की में एक दिन हार जाऊँगी परंतु आस है उस किरण की जो एक दीप जलाएगी और कहेगी, हो गया है सवेरा अब अपने जीवन का तू खुद दर्पण बन  तेरी रूह का विश्लेषण है ये अब तेरा मन  देख अपनी वास्तविकता जो है तेरे सपनों के मकान जैसा  सुन ली गई है तेरी हर वो अर्ज़ जो गोदी थी तूने उस मकान के दीवारों में  यह तेरा रास्ता है, मंज़िल सामने है और यह दर्पण है,  कर प्रतिबिम्ब अपनी वास्तविकता का  बना मनोबल इतना की फिर ना करे तू यात्रा ना भूत में ना भविष्य में, तेरी सच्चाई ही तेरा वर्तमान है, खुल के जी ले अब इसमें .. फिर थामूँगी में हाथ अपनी ज़िंदगी का ओर चलूँगी खुद के साथ मिला कर चार कदम  ना होगा परेशान चित्त ना होगा अशांत मन  बस जीवन से प्रेम होगा और भरोसा उस स्वप्न पर  ~poetessworld62  ♥️