सपनों का मकान


खुद से दूर भागती हूँ जब सच्चाई का प्रतिबिम्ब आँखों  में होता है 

मैं अक्सर सपनों  का मकान बनाती  हूँ  जो सच्चाई से मीलों दूर होता है

कब तक भागूँ आख़िर थक जाऊँगी 

अंतर्मन सब जानता है की में एक दिन हार जाऊँगी

परंतु आस है उस किरण की जो एक दीप जलाएगी और कहेगी, हो गया है सवेरा अब अपने जीवन का तू खुद दर्पण बन 

तेरी रूह का विश्लेषण है ये अब तेरा मन 

देख अपनी वास्तविकता जो है तेरे सपनों के मकान जैसा 

सुन ली गई है तेरी हर वो अर्ज़ जो गोदी थी तूने उस मकान के दीवारों में 

यह तेरा रास्ता है, मंज़िल सामने है और यह दर्पण है,  कर प्रतिबिम्ब अपनी वास्तविकता का 

बना मनोबल इतना की फिर ना करे तू यात्रा ना भूत में ना भविष्य में,

तेरी सच्चाई ही तेरा वर्तमान है, खुल के जी ले अब इसमें ..


फिर थामूँगी में हाथ अपनी ज़िंदगी का ओर चलूँगी खुद के साथ मिला कर चार कदम 

ना होगा परेशान चित्त ना होगा अशांत मन 

बस जीवन से प्रेम होगा और भरोसा उस स्वप्न पर 

~poetessworld62 

♥️






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