सर्वव्यापी प्रभु


मन में आया की कुछ लिखूँ तेरे लिएपरंतु क्या लिखूँ जब तू ही मेरा रचियता हैतू ही सर्वज्ञ है 


तू सर्वव्यापी हैतू ही सर्वत्र हैहे मेरे प्रभु 

मैं तो एक धूल का कण हूँ जो शायद  तेरे हल्के से एक तेज को भी सम्भाल ना पाऊँ 


भले ही सम्भाल ना पाऊँ लेकिन समझ मैं जाती हूँ तेरी हर चाल 

हर चाल उस हाल में ना समझ पाऊँ लेकिन देर सवेर लगने लगता है कि तू ही था तू ही है 


तू ही है  जिसको हर पल महसूस किया है हर सुख और हर दुःख में 

सुख और  दुःख तो कड़ियाँ हैं जो तूने जोड़ी हैं अपने स्मरण के लिए अंतर्मन में 


वरना ये इंसान भी कैसा तूने बनाया जो अपने बनाने वाले को ही भूल बैठा है

घड़ा कुम्हार को क्या जाने,
ख़रीददार को ही मालिक माने


अनंत सागर का रचयिता तू,
मैं एक बूँद तेरी कृति की।
कुछ तो सामंजस्य होगा मेरा भी,
जो पूर्ण करे तेरे उद्देश्य की।


बहुत सुना और पढ़ा है तेरा वर्णन,
अनेकों युगों में, अनेकों रूपों में।
इस कलियुग में भी हो जाए तेरा दर्शन,
यही आस यह इंसान लगाए बैठा है हृदय में।


~poetessworld62  





Comments

Popular posts from this blog

सत्य का दर्पण

पिंजरे का पंछी