सत्य का दर्पण

सत्य का दर्पण

असहज मन में सवाल आया अस्तित्व के सत्य का
प्रकृति में उत्तर ढूँढा तो आनंद को पाया
परंतु सहज शीतलता बहुत दूर थी।

शीतलता की खोज में निकली तो सितारों को पाया
झिलमिल ज्योति पर तृप्ति न मिली।
सोचा, मंज़िल अभी है दूर,
तो रोशनी की राह पकड़ी, पाया सूरज भरपूर।
परंतु परितोष फिर भी न आया,
मन का दर्पण कांती से ओझल पाया।

कांति की खोज में अनंत का ध्यान आया
और अनंत की खोज में ब्रह्मांड को पाया

परंतु अभी भी समाधान न पाया
अब सोचा कि शांत है बहुत दूर

शांत की खोज में निकली तो धुन को पाया
आलोक तो मिला परंतु एकाकार न पाया।

एकांत की खोज में सच ढूँढने निकली तो शून्य को पाया,
और पाया कि अनंत तो मेरे अंदर ही था और मैं हमेशा से शून्य।

मृगतृष्णा में फँसी.. प्रकृति को विनाश समझी और विनाश को सत्य।
परंतु सत्य केवल अनंत को ही पाया और अनंत को  ही शून्य।
शून्य ही आरंभ, शून्य ही अंत और शून्य ही शांत, एकांत और पूर्ण सत्य।

~poetessworld62 
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