प्रेम का धन



इतनी धनी तो मैं नहीं की कोई सबसे मूल्यवान वस्तु माँगे और मैं दे सकूँ 

परंतु हाँइतनी धनी मैं अवश्य हो जाऊँ कि करना पड़े भाव कम उस मूल्यवान वस्तु का तो नाम तेरा ले सकूँ 


किसी को चाहने की पराकाष्ठा अगर हो तो हमेशा तू ही चिंतन में रहे 

इतनी सहज तो मैं नहीं कि वरण तेरा विस्मरण रहे 


कोई पूछे मुझसे अगर दिन भर  का सबसे सुंदर पल मेरा.

तो जब भी होंठों को छू जाए नामआँखो में उतरे छवि एवं पलकों  को हो दर्शन तेरा

जवाब बस यही हो मेरा


हर श्वास में बस जाए तू इस तरह कि दरिया की तरह बहे स्मरण तेरा 

बात करे कोई प्रेम  की तो दमक उठे आवेग मेरा 



यह किसी ने पूछा था राह चलते मुझसे कि  क्या चाहती  है कैसा हो साथी  तेरा ..

थोड़ा तो मनन किया  मैंने परंतु जब मन में आया प्रतिबिम्ब तेरा तो सवाल छोटा और जवाब बढ़ता चला गया

थोड़ा थम के जब निकलने लगी यह सब बातें मुख से मेरे 

तो विश्वास ही नहीं हुआ कि कब हुई मैं इतने अधीन तेरे’


क्या चाहती हूँ मैंयह तो बता दिया उसके उत्तर में 

परंतु तुझको  चाहती हूँइसका व्याख्यान  लायी हूँ इस काग़ज़ में

~poetessworld62 

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